लोभी व्यापारी और बुद्धिमान यात्री की कहानी हिंदी में | Panchatantra Moral Story

एक समय की बात है, एक लोभी व्यापारी नदी पार करके दूर के बाजार में जाया करता था। उसी नाव में एक गरीब यात्री भी सवार था। यात्री के पास सिर्फ एक छोटा-सा कपड़े का थैला था—जिसमें उसका थोड़ा-बहुत खाना और कुछ साधारण सामान रखा था।
व्यापारी ने सोचा कि थैले में जरूर कोई कीमती चीज़ होगी। उसने मन ही मन योजना बनाई—
“नदी के बीच पहुँचकर मौका मिलते ही मैं यह थैला लेकर भाग जाऊँगा!”

जब नाव नदी के गहरे हिस्से में पहुँची, व्यापारी मुस्कुराते हुए यात्री के पास गया और बोला,
“भाई, तुम्हारा थैला बहुत अच्छा लग रहा है। जरूर इसमें कुछ कीमती चीज़ होगी?”

यात्री ने कहा,
“नहीं भाई, खास कुछ नहीं। लेकिन हाँ, इस थैले में एक बहुत ज़रूरी चीज़ है—इसलिए इसे मजबूती से बाँधकर रखा है।”

यह सुनकर व्यापारी और भी लालची हो गया।

जब नाव बिल्कुल बीच धारा में पहुँची, तब व्यापारी अचानक थैला छीनकर नदी में कूद गया। वह तैरकर थोड़ा दूर गया और थैला खोलते ही दंग रह गया!
अंदर सिर्फ सूखी रोटी, दो पत्थर और एक चिट्ठी थी।
चिट्ठी में लिखा था—

“लोभ में पड़कर जो व्यक्ति किसी और की चीज़ लेना चाहता है, वह कभी सफल नहीं होता। इंसान महँगी चीज़ें नहीं ढोता—महँगी होती है उसकी नीयत।”

यह पढ़कर व्यापारी शर्म से सिर झुका लिया। नाव के सभी लोग उसे डाँटने लगे।
और गरीब यात्री शांत स्वर में बोला—
“लोभ इंसान को अंधा बना देता है।”

नीतिकथा:

लोभ इंसान को विनाश की ओर ले जाता है। ईमानदारी हमेशा जीतती है।

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