सारस और केकड़ा

एक समय की बात है, एक शांत तालाब में बहुत-सी मछलियाँ, मेंढक और केकड़े रहते थे। तालाब के किनारे एक बूढ़ा सारस रहता था, जो हर दिन पानी के पास खड़ा होकर मछलियाँ पकड़कर खाता था।

समय बीतता गया और सारस बूढ़ा हो गया। अब उसके लिए पहले की तरह मछली पकड़ना आसान नहीं रहा।
एक दिन उसने सोचा, “ऐसे तो भूखा मर जाऊँगा, कुछ उपाय सोचना होगा।”
फिर उसके मन में एक चालाक योजना आई।

सारस एक दिन तालाब के किनारे गया और उदास चेहरा बनाकर बोला,
“अरे मछलियो, मुझे बहुत दुख है! मैंने सुना है कि लोग इस तालाब को भरकर खेती करने वाले हैं। तब यहाँ पानी नहीं रहेगा और तुम सब मर जाओगी।”

यह सुनकर सारी मछलियाँ बहुत डर गईं। वे रोने लगीं, “अब हम क्या करें, सारस दादा?”

सारस ने कहा, “चिंता मत करो। मैं तुम्हें एक बड़े तालाब में पहुँचा दूँगा जहाँ बहुत पानी और खाना है।
लेकिन मैं बूढ़ा हूँ, इसलिए एक बार में कुछ ही को ले जा सकता हूँ।”

मछलियाँ खुशी-खुशी तैयार हो गईं। पर उन्हें यह नहीं पता था कि सारस का असली इरादा क्या है।
हर दिन सारस कुछ मछलियाँ लेकर जाता, लेकिन बड़े तालाब में नहीं — बल्कि पहाड़ी पर!
वहाँ वह उन्हें मारकर खा जाता और उनकी हड्डियाँ वहीं फेंक देता।

कुछ दिनों बाद तालाब का एक केकड़ा बोला,
“सारस दादा, मुझे भी उस बड़े तालाब में ले चलिए न!”
सारस ने सोचा, “वाह! आज तो कुछ नया स्वाद मिलेगा।”
वह मान गया।

रास्ते में केकड़े ने पूछा,
“दादा, वो बड़ा तालाब कहाँ है?”
सारस हँसा और बोला, “वो देखो सामने पहाड़ी! वहीं तुम्हारा नया घर है, हाहाहा!”

केकड़े ने नीचे देखा — वहाँ मछलियों की हड्डियाँ बिखरी थीं।
वह सब समझ गया कि सारस उसे भी मारने वाला है।

तुरंत उसने अपनी मजबूत पंजों से सारस की गर्दन पकड़ ली और कसकर दबा दिया।
सारस छटपटाता रहा, पर केकड़े ने तब तक नहीं छोड़ा जब तक सारस मर नहीं गया।

फिर केकड़ा धीरे से  तालाब में लौट आया और सबको पूरी बात बताई।
सभी खुश हुए कि दुष्ट सारस को उसकी सज़ा मिल गई।


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🌿 कहानी की सीख:

👉 मुसीबत में कभी घबराओ नहीं।
👉 शांत दिमाग से सोचो, तो हर समस्या का हल मिल सकता है।
👉 और हमेशा याद रखो — हर कोई दोस्त नहीं होता, इसलिए सतर्क रहो।

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